बंद बक्सोमें आधी जिंदगी रखकर , आज नया घरोंदा सजाने चल पडी।
कुछ अपने साथ और बहोत कुछ पीछे छोड चली।
कितना भी समेटू , पर कुछ तो पीछे छुटनाही था।
दीवार से नापी ऊंचाई,
अलमारी पे लगी बिंदी ,
और वो .. वो मेरा सुकूनभरा कोना।
कितनाभी समेटू , पर कुछ तो पीछे छुटनाही था।
झुले पर बैठ, कानोसे सरकती हवा,
झोको के साथ गुनगुनाइ गझले,
और खुद के साथ बिताई हर वो शाम।
कितनाभी समेटू , पर कुछ तो पीछे छुटनाही था।
--मीता मेहेर
30-08-2019
कुछ अपने साथ और बहोत कुछ पीछे छोड चली।
कितना भी समेटू , पर कुछ तो पीछे छुटनाही था।
दीवार से नापी ऊंचाई,
अलमारी पे लगी बिंदी ,
और वो .. वो मेरा सुकूनभरा कोना।
कितनाभी समेटू , पर कुछ तो पीछे छुटनाही था।
झुले पर बैठ, कानोसे सरकती हवा,
झोको के साथ गुनगुनाइ गझले,
और खुद के साथ बिताई हर वो शाम।
कितनाभी समेटू , पर कुछ तो पीछे छुटनाही था।
--मीता मेहेर
30-08-2019