Thursday, August 29, 2019

जिंदगी

बंद बक्सोमें आधी जिंदगी रखकर , आज नया घरोंदा सजाने चल पडी।
कुछ अपने साथ और बहोत कुछ पीछे छोड चली।


कितना भी समेटू , पर  कुछ तो पीछे छुटनाही था।
दीवार से नापी ऊंचाई,
अलमारी पे लगी बिंदी ,
और वो .. वो  मेरा सुकूनभरा कोना।
कितनाभी समेटू , पर  कुछ तो पीछे छुटनाही था।

झुले पर बैठ, कानोसे सरकती हवा,
झोको के साथ गुनगुनाइ गझले,
और खुद के साथ बिताई हर वो शाम।
कितनाभी समेटू  , पर  कुछ तो पीछे छुटनाही था।

--मीता मेहेर
30-08-2019

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