आधी खुली खिडकीसे दिखता आसमाँ अधुरासा और मेरे हिस्से का सूरज भी था आधा
कैसे दिन है .. जहाँ रोज का जीना लगे अधुरासा
एक जान है जो घर में अटकती है
दूसरी जो रास्ते रास्ते भटकती है
और कुछ का साथ, सांसे छोड़ जाती है
कुछ तो हो जो बांधे रखे
एक उम्मीद .. एक ख्वाब
के फिर से वो आसमान हो मेरा
और वो सूरज भी हो पूरा
--मीता मेहेर
(२४-०५-२०२०)
Woww....
ReplyDeleteThank you :-)
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